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भारत में क्रिकेट का जुनून, आज भी है, पहले भी खूब था, चलता ही रहेगा

जिस दिन मैच शुरू होता, उस दिन सुबह से ही स्टेडियम के बाहर अंदर जाने के लिए लाइनें लग जाती थी। मैच शुरू होने से दो-एक घंटा पहले ही पूरा स्टेडियम भर जाता। जितनी भीड़ स्टेडियम के अंदर होती थी, उससे अधिक भीड़ स्टेडियम के बाहर टिकट पाने के लिए बदहवास सी घूमती नजर आती थी।

Images: X @BCCI

भारत में क्रिकेट (वनडे) का वर्ल्ड कप चल रहा है। पूरे देश में उत्सव जैसा माहौल है। जिस शहर में मैच होता है, उस शहर की रौनक ही अलग नजर आती है। चूंकि क्रिकेट का मैच अब टीवी चैनलों पर भी चल रहा है और माना जाता है कि इन चैनलों पर मैच देखने का मजा स्टेडियम में चल रहे लाइव मैचों से ज्यादा होता है। लेकिन कभी वो भी दौर था, जब भारत में घरों में बहुत कम टीवी हुआ करते थे और टीवी पर क्रिकेट भी तब ही आता था, जब वह उसी शहर में खेला जा रहा हो, उस वक्त क्रिकेट देखने के लिए भारी बवाल मचता था और टिकट पाने के लिए या स्टेडियम में घुसने के लिए लोग खासे प्रपंच करते थे। हम आपको पुराने दौर के एक क्रिकेट मैच के बारे में ‘कमेंट्री’ का मजा दिलाते हैं, जब मैच देखना एक उत्सव या कहें जुनून सरीखा हुआ करता था। असल में क्रिकेट को लेकर भारत में खासा जुनून है। यह पहले भी था, आज भी है और आगे भी रहेगा।

पुराने दौर में हम आपको दिल्ली के फिरोजशाह स्टेडियम (अरुण जेटली स्टेडियम) के बारे में बताते हैं, जहां पर आज भी क्रिकेट मैच हुआ करता है। चूंकि यह स्टेडियम पुरानी दिल्ली के करीब है, इसलिए वहां के लोग मैच को देखने के लिए कई दिन पहले से ही तरकीबें लगाना शुरू कर देते थे। आज तो मैच की टिकटें ऑनलाइन उपलब्ध हैं लेकिन उस वक्त मैच के टिकट स्टेडियम के बाहर खिड़कियों पर बिकते थे। लेकिन एकाध दिन बिकते और टिकट खत्म होना बता दिया जाता। उस दौरान भी आज की तरह नेताओं, सरकारी नौकरी करने वाले अफसरों के पास क्रिकेट के टिकट पहले पहुंच जाते। उनसे टिकट लेने के लिए लोग खासी चिरौरी करते नजर आते। जान-पहचान वाले लोग तो नेताओं के यहां सुबह से ही डेरा डाल देते, लेकिन एकाध किसी खास बंदे पर ही नेता की मेहरबानी हो पाती थी। सरकारी अधिकारी अपने बच्चों या रिश्तेदारों को टिकट थमा देते थे। जिन बच्चों के पास टिकट होता था, उसे स्कूल में हीरो समझा जाता था और दूसरे बच्चे क्रिकेट तो दूर, बस टिकट को हाथ में थामकर ही धन्य हुए जाते थे।

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भारत में क्रिकेट को लेकर दीवानगी का आलम है।

जिस दिन मैच शुरू होता, उस दिन सुबह से ही स्टेडियम के बाहर अंदर जाने के लिए लाइनें लग जाती थी। मैच शुरू होने से दो-एक घंटा पहले ही पूरा स्टेडियम भर जाता। जितनी भीड़ स्टेडियम के अंदर होती थी, उससे अधिक भीड़ स्टेडियम के बाहर टिकट पाने के लिए बदहवास सी घूमती नजर आती थी। दरिया गंज और दिल्ली गेट की सड़कों और गलियों में लोग टिकट बेचते थे और वहां टिकटों को लेकर लड़ाई-झगड़े तक हो जाया करते थे। जिन लड़कों को टिकट नहीं मिलता था, वे स्टेडियम से सटी इमारतों पर चढ़ जाते थे। उस वक्त वहां कोई भी इमारत ऐसी नहीं थी, जहां से स्टेडियम पूरा नजर आए, लेकिन फिर भी लोग और युवा उन पर चढ़ दिखाई देते थे। इस मसले पर दिल्ली गेट का खूनी दरवाजा लोगों को लुभाता था। लोग उस पर चढ़ जाते थे और मैच खत्म होने तक वहीं से मैच देखते रहते थे। पांच दिन तक खूनी दरवाजे के ऊपर लोगों की खासी भीड़ दिखाई देती थी और उसके नीचे चना-चबेना बिकता था।

उस वक्त फिरोजशाह स्टेडियम में होने वाले मैचों में अधिकतर में इंडिया की टीम हारती ही थी। उसके बावजूद लोग निराश नहीं होते थे और पूरा मैच देखते थे। क्रिकेट का मैच पुरानी दिल्ली के लोगों के लिए उत्सव सरीखा था। जब मैच ड्रॉ होता था तो उसके आखिरी दिन पुलिस वाले बिना टिकट वालों को स्टेडियम में जाने की इजाजत दे देते थे। अंदर जाओ तो स्टैंड पहले से ही पूरे फुल होते थे। बिना टिकट वाले लोग स्टैंडों के नीचे की समतल जमीन पर बैठ जाते थे तो वहीं से मैच का लुत्फ उठाते थे। इस दौरान स्टेडियम में ट्रांजिस्टर ले जाने की मनाही नहीं थी। अंदर जिसके पास ट्रांजिस्टर होता था, उसके आसपास तो भीड़ की खासी मारामारी होती थी। बाहर गलियों और सड़कों में जो व्यक्ति ट्रांजिस्टर लिए होता था, वह वीआईपी जैसी हरकत करता नजर आता था।

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