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मालदीव राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण में पीएम नरेंद्र मोदी जाएंगे क्या?

मालदीव में सत्ता परिवर्तन के इस सियासी घटनाक्रम के बीच एशियाई भू—भागीय राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर रखने वालो के बीच यह सवाल तेजी से चल रहा है कि क्या भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मालदीव के नए राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण समारोह मे जाएंगे।

संतोष

ऐसे समय में जब भारत के लिए वैश्विक कूटनीतिक परिदृश्य में अफगानिस्तान और कनाडा के साथ उपजी स्थिति चुनौती बनी हुई है, भारत के सामने मालदीव में सत्ता परिवर्तन नए तरह की आशंका और मुश्किल लेकर आता दिख रहा है। मालदीव के नए राष्ट्रपति मोहम्मद मोइज्जू खुले रूप से चीन समर्थक रहे हैं। उन्होंने अपने चुनाव प्रचार की थीम ही इंडिया आउट रखी थी।

वह चीन समर्थक और वर्तमान में भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में बंद पूर्व राष्ट्रपति यामीन के प्रशंसक और करीबी भी हैं। ऐसे में यह माना जा रहा है कि आने वाले समय में मालदीव के मोर्चे पर भी भारत के लिए राह कठिन होने वाली है। मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद सोलिह भारत के प्रति मित्रता रखते थे। उन्होंने इंडिया फस्ट की नीति अपनायी हुई थी। दोनों देश के बीच उनके शासनकाल में रिश्ते प्रगाढ़ हुए थे। इसकी वजह से चीन को रणनीतिक रूप से अहम मालदीव में पैर जमाने का अवसर नहीं मिल रहा था।

मालदीव के नए राष्ट्रपति मोहम्मद मोइज्जू खुले रूप से चीन समर्थक रहे हैं।

मालदीव में सत्ता परिवर्तन के इस सियासी घटनाक्रम के बीच एशियाई भू-भागीय राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर रखने वालो के बीच यह सवाल तेजी से चल रहा है कि क्या भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मालदीव के नए राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण समारोह मे जाएंगे। दुनिया भर के विश्लेषक इस आधार पर भारत और मालदीव के बीच आने वाले समय में बनने—बिगड़ने वाले रिश्तों का आकलन करना चाहते हैं।

इन विश्लेषकों का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी विदेश नीति को नेबरहुड फस्ट या पड़ोसी प्रथम पर आधारित बताते रहे हैं। ऐसे में नए परिदृश्य में भी क्या वह इसी नीति को अपनाएंगे। हालांकि इधर, भारतीय विदेश मंत्रालय का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मालदीव के नए राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण समारोह में जाने का सवाल उस समय उत्पन्न होगा। जब उनके शपाथ ग्रहण समारोह की तिथि नजदीक आएगी।

यही नहीं, यह भी देखना होगा कि मालदीव अपने अगले राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण समारोह के लिए किन नेताओं को निमंत्रण देता है। इसके अलावा यह भी देखना होगा कि उस समय क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश दौरे के लिए उपलब्ध हैं। हालांकि यह तय है कि निमंत्रण आने पर प्रधानमंत्री या उनकी ओर से नियुक्त कोई प्रतिनिधि अवश्य ही शपथ ग्रहण समारोह में हिस्सा लेगा।

मालदीव की भौगोलिक स्थिति उसे रणनीतिक रूप से अहम बनाती है। हिंद महासागर में उसकी जहां उपस्थिति है। वहां से दुनिया के जहाज गुजरते हैं। खाड़ी देशों से आने वाला तेल भी वहां से होकर गुजरता है। ऐसे में चीन इस रूट पर अपना प्रभुत्व बढ़ाना चाहेगा। यही नहीं, वह हिंद महासागत की निगरानी के लिए भी मालदीव का उपयोग करना चाहेगा। इस समय भारत यह निगरानी करता है।

चीन ने करीब 1200 द्वीप वाले मालदीव में पहले से ही एक द्वीप को 40 लाख डॉलर में 50 वर्षो के लिए लिया हुआ है। उसकी नीति रही है कि वह छोटे देशों को बड़ा कर्ज देकर उसे अपने ऊपर आश्रित कर  लेता है। जिसके बाद उसकी भूमि और अन्य संसाधन का वह दोहन करता है। जबकि उसके कर्ज के जाल में फंसे देश बर्बाद हो जाते हैं। श्रीलंका इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। चीन ने मोहम्मद सोलिह के शासनकाल से पहले यामीन और कुछ अन्य राष्ट्रपतियों के शासनकाल में यहां पर अरबो रूपये का निवेश ढांचागत परियोजनाओं में किया हुआ है। उसका प्रयास रहेगा कि वह मोइज्ज के शासनकाल में अपना आर्थिक प्रभाव यहां पर बढ़ाए। जिससे भारत को आने वाले समय में इसकी वजह से यहां पैर जमाने में समस्या हो।

यामीन के शासनकाल में मालदीव ने चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशियेटिव को भी समर्थन दिया था। वह उस योजना को भी गति देना चाहेगा। भारत इस योजना का शुरू से इस आधार पर विरोध करता रहा है कि यह पाक अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरता है और इसके लिए भारत से संस्तुति लेने की जगह चीन ने इसको लेकर पाक से मंजूरी हासिल की। जबकि यह भारत का हिस्सा है।

मोहम्मद सोलिह के शासनकाल के समय में भारत और मालदीव के बीच रिश्ते काफी बेहतर हुए थे। भारत ने मालदीव को दो हेलिकॉटपर और एक हवाई जहाज भी दिया था। जिसका उपयोग संकट की स्थिति में लोगो को बचाने और एक से दूसरी जगह ले जाने के लिए किया जाना प्रस्तावित था। इनकी देखरेख और संचालन के लिए भारत ने वायु सेना के करीब 75 अधिकारी—जवान भी वहां तैनात किये हुए हैं।

मोहम्मद मोइज्जू ने इसे ही अपने चुनाव में बड़ा मुद्दा बनाया। उसने कहा कि वह सत्ता मे आए तो भारत को यहां से निकालेंगे। इसके लिए उसने इंडिया आउट का नारा दिया। यह कहा जा रहा है कि नवंबर में जब मोइज्जू सत्ता संभालेंगे तो मालदीव में भारत विरोधी अभियान को काफी गति मिलेगी। जिससे निपटना भारत के लिए काफी मुश्किल होगा।

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