Skip to content

विशेष लेख: परदेस जाकर भी अपनी पहचान न मिटने दें

परदेस में रह कर भी अपने देश के सांस्कृतिक एवं नैतिक मूल्यों को न छोड़ने की सीख मुझे महर्षि दयानंद सरस्वती द्वारा रचित सत्यार्थ प्रकाश के दशवें समुल्लास से ही मिली। वह कहते थे कि परदेस में रहकर अपने खान-पान व आचरण को नहीं बिगाड़ना चाहिए।

अमेरिका-यात्रा की तैयारी- 9

भारत के राज्य राजस्थान के अजमेर में, जहां आर्य सम्राट पृथ्वीराज चौहान की कर्मभूमि है, वहीं अरावली पर्वतमाला से सटे विश्व के एक अनुपम सुरम्य तीर्थ पुष्कर के कारण भी विख्यात है। अर्णोराज द्वारा बनायी गई विशाल आनासागर झील तथा तारागढ़ किले की शोभा वाले इस ऐतिहासिक नगर को विदेशी आक्रम​णकारियों द्वारा दूषित व खंडित भी किया गया।

महायोगी महर्षि दयानंद सरस्वती ने भी योगसाधना व वेदभाष्य स्वरूप तपस्या की है।

अध्यात्म व शांति की अदृश्य दिव्य रश्मियों का यहां अद्भुत् संकुल निर्मित हुआ है। इस क्षेत्र में जहां महर्षि ब्रह्मा, अगस्त्य, वामदेव, जमदग्नि, भर्तृहरि एवं महाराजा अजयपाल ने तप किया, वहीं उन्नीसवीं सदी के महान सुधारक, महायोगी महर्षि दयानंद सरस्वती ने भी योगसाधना व वेदभाष्य स्वरूप तपस्या की है।

This post is for paying subscribers only

Subscribe

Already have an account? Log in

Latest